गाज़ा युद्धविराम का इज़रायल ने 591 बार उल्लंघन किया, 350 से ज़्यादा फ़लस्तीनी शहीद
dailyhulchul
गाज़ा सिटी, 3 दिसंबर 2025 – गाज़ा के सरकारी मीडिया ऑफ़िस के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, 10 अक्टूबर 2025 को लागू हुए युद्धविराम के बाद से इज़रायल ने अब तक 591 बार इसका उल्लंघन किया है। इन उल्लंघनों में हवाई हमले, गोलीबारी और सहायता रोकना शामिल है, जिसमें 350 से ज़्यादा फ़लस्तीनी शहीद हो चुके हैं और लगभग 1,000 घायल हुए हैं।
अमेरिका, मिस्र, क़तर और तुर्की की मध्यस्थता से हुआ यह युद्धविराम शुरू में उम्मीद जगाता दिखा था, लेकिन 13 अक्टूबर को 30 देशों की मौजूदगी में हुए हस्ताक्षर समारोह में न तो इज़रायल था और न ही हमास – जिससे शुरू से ही संदेह पैदा हो गया था।
गाज़ा सरकार के मुताबिक़ उल्लंघनों का ब्यौरा:
- आम नागरिकों पर गोलीबारी: 164 बार
- “येलो लाइन” से आगे आवासीय इलाक़ों में छापे: 25 बार
- बमबारी और गोलाबारी: 280 बार
- घरों-इमारतों को ढहाना: 118 बार कुल उल्लंघन: 591
अल जज़ीरा की निगरानी के अनुसार, 54 दिनों के युद्धविराम में सिर्फ़ 11 दिन ही ऐसे रहे जब इज़रायल की ओर से कोई हमला, हताहत या घायल होने की ख़बर नहीं आई। बाक़ी 43 दिनों में हमले होते रहे।
सबसे ख़ूनी दिन:
- 19 अक्टूबर: 45 शहीद
- 29 अक्टूबर: 109 शहीद (जिनमें 52 बच्चे शामिल)
- 22 नवंबर: 21 शहीद
मानवीय सहायता भी बुरी तरह प्रभावित है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 10 अक्टूबर से 1 दिसंबर तक सिर्फ़ 6,277 सहायता ट्रक ही गाज़ा पहुंच सके, जो ज़रूरत का महज़ एक छोटा हिस्सा है।
क़ैदी-बंदी आदान-प्रदान में कुछ प्रगति हुई है। हमास ने सभी 20 जीवित इज़रायली बंधकों को रिहा कर दिया और 26 शव भी सौंपे। बदले में इज़रायल ने 250 लंबी सज़ा काट रहे और 1,700 अन्य फ़लस्तीनी क़ैदियों को रिहा किया।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने युद्धविराम को “मज़बूत” बताया है, जबकि फ़लस्तीनी अधिकारी और सहायता संगठन इसे पूरी तरह टूटा हुआ बता रहे हैं।
मुख्य बिंदु
- युवा मतदाता पंजीकरण में 67% की वृद्धि दर्ज की गई है
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं
- 18-25 आयु वर्ग के युवा अब राजनीतिक बहसों में सक्रिय भागीदारी ले रहे हैं
- क्लाइमेट चेंज और डिजिटल राइट्स टॉप प्राथमिकताओं में शामिल हैं
"आज का युवा केवल मतदाता नहीं है, बल्कि वह नीति निर्माण में भी अपनी भूमिका निभाना चाहता है। यह परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है।"
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