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‘धुरंधर’ मूवी रिव्यू: ठंडा परोसा गया बदला

dailyhulchul

10 December, 2025 5 मिनट पढ़ें
‘धुरंधर’ मूवी रिव्यू: ठंडा परोसा गया बदला

‘धुरंधर’ एक बड़े पैमाने पर बनाई गई जासूसी थ्रिलर है, जिसकी प्रेरणा कंधार एयर इंडिया अपहरण से लेकर 2001 संसद हमले तक की वास्तविक घटनाओं से ली गई है। यह फिल्म उन छुपे हुए नायकों को सलाम करती है जो अजीत डोभाल जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतिकारों की तरह देश के लिए परदे के पीछे काम करते हैं—जिन्हें फिल्म में अजय संयाल के रूप में आर. माधवन निभाते हैं।
निर्देशक आदित्य धार की 212 मिनट लंबी यह फिल्म राष्ट्रवादी सिनेमे के उसी ढर्रे पर चलती है, जिसकी मिसाल ‘उरी’ और ‘आर्टिकल 370’ में देखी गई थी—जहाँ बेबाक हिंसा, रियल फुटेज, कच्ची भाषा और कश्यप-स्टाइल सिनेमा का मिश्रण दिखता है।


कहानी (बिना स्पॉइलर के)

फिल्म का केंद्र है—हमजा (रणवीर सिंह), एक बेखौफ रॉ एजेंट, जो पाकिस्तान के बदनाम ल्यारी अंडरवर्ल्ड में घुसपैठ करता है। उसका मिशन: गैंगस्टर–आईएसआई गठजोड़ को तोड़ना, जो भारत के कई बड़े आतंकी हमलों के पीछे माना जाता है।
वह रहमान डाकैत (अक्षय खन्ना) के गैंग में जगह बनाता है, जो एक लालची राजनेता जमील जमाली (राकेश बेदी) के लिए काम करता है। अध्यायों में बंटी कहानी बलोच राजनीति, सत्ता के खेल और षड्यंत्रों की परतें खोलती है।


आलोचनात्मक नजर

फिल्म की आत्मा “घर में घुसकर मारेंगे” वाले एटिट्यूड से चलती है। किरदार असल जिंदगी के पाकिस्तानी नामों से प्रेरित लगते हैं। लेकिन चौधरी असलम (संजय दत्त) और मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) जैसे सबप्लॉट कहानी को भटकाते हैं और रफ्तार को कमजोर करते हैं।
फिल्म राजनीतिक बयानबाज़ी को आगे बढ़ाती है, मगर जिस तीखेपन का दावा करती है, उसे खुद पूरा नहीं कर पाती।


क्या जमता है?

  • अक्षय खन्ना का यादगार अभिनय — रहमान डाकैत के रूप में उनका ठंडा स्वभाव और डर पैदा करने वाली आँखें हर दृश्य पर हावी रहती हैं।
  • राकेश बेदी का मनोरंजक लेकिन घृणित राजनेता अवतार, रणवीर सिंह की तीव्रता और शशवत सच्चदेव का धड़कता संगीत।
  • अक्षय–राकेश की टकराहट, शूटआउट सीक्वेंस और संवाद फिल्म को ज़मीन पर रोके रखते हैं।

क्या खटकता है?

  • लंबी अवधि और ढीली गति – बहुत सारे किरदार और सबप्लॉट कहानी को थकाऊ बना देते हैं।
  • रणवीर का ट्रेलर जैसा “जंगली एनर्जी” वाला एक्शन कम नजर आता है।
  • सारा अर्जुन के साथ कैमिस्ट्री फीकी, कई दृश्य सिर्फ “हाइप” पर टिका हुआ लगता है—गहराई कम, दिखावा ज्यादा।

अंतिम फैसला

‘धुरंधर’ एक भव्य लेकिन खिंची हुई राष्ट्रवादी जासूसी कथा है, जिसमें दमदार एक्टिंग है, पर गति की कमजोरियां इसे पीछे खींचती हैं। फिर भी कहानी ऐसे मोड़ पर खत्म होती है कि दर्शक इसके अगले भाग का इंतजार ज़रूर करेंगे—चाहे यह फिल्म अपनी पूरी हाइप पर खरी न उतरी हो।

मुख्य बिंदु

  • युवा मतदाता पंजीकरण में 67% की वृद्धि दर्ज की गई है
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं
  • 18-25 आयु वर्ग के युवा अब राजनीतिक बहसों में सक्रिय भागीदारी ले रहे हैं
  • क्लाइमेट चेंज और डिजिटल राइट्स टॉप प्राथमिकताओं में शामिल हैं

"आज का युवा केवल मतदाता नहीं है, बल्कि वह नीति निर्माण में भी अपनी भूमिका निभाना चाहता है। यह परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है।"

— डॉ. राजेश कुमार, राजनीतिक विश्लेषक, JNU

सांख्यिकी और तथ्य

67%
युवा मतदाता पंजीकरण में वृद्धि
45%
युवा राजनीतिक चर्चाओं में भागीदारी
78%
सोशल मीडिया पर राजनीतिक कंटेंट शेयर करते हैं
5.2M
नए युवा मतदाता रजिस्ट्रेशन

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