उत्तरी कोरदोफ़ान में सेना की बड़ी कामयाबी, RSF ने सबूत मिटाने के लिए जलाईं लाशें
dailyhulchul
सूडान में जारी गृहयुद्ध के बीच सरकारी समर्थित सूडानी सेना (SAF) ने उत्तरी कोरदोफ़ान राज्य में दो अहम इलाकों— क़ज़क़ील और उम् दम हज अहमद— को RSF के कब्जे से मुक्त करा लिया है।
इसी बीच, दारफूर के अल-फ़ाशेर क्षेत्र से बेहद चिंताजनक खबरें सामने आई हैं, जहां RSF लड़ाके कथित तौर पर सामूहिक हत्याओं के सबूत छुपाने के लिए शवों को जलाने और दफनाने में लगे हैं।
ऑनलाइन वायरल हुई फुटेज में सेना के जवान हथियारों के साथ जश्न मनाते दिखे, जो यह संकेत देता है कि आने वाले दिनों में उत्तरी कोरदोफ़ान में और भारी लड़ाई देखने को मिल सकती है। क़ज़क़ील, जिसे अक्टूबर के अंत में RSF ने कब्जा लिया था, रणनीतिक शहर अल-ओबेद के दक्षिण में स्थित है—यह वही शहर है जिसे RSF लंबे समय से जीतने की कोशिश कर रहा है।
युद्ध का नक्शा बदला, लड़ाई अब देश के पूर्वी हिस्सों की ओर झुकी
अप्रैल 2023 में शुरू हुआ यह संघर्ष अब तीसरे साल में प्रवेश कर चुका है। RSF पश्चिमी सूडान में अपना दबदबा बढ़ाने के बाद अब देश के मध्य और पूर्वी क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा है, जबकि सेना हर कीमत पर अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखना चाहती है।
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यह संकट दुनिया का सबसे बड़ा विस्थापन संकट बन चुका है —
1.2 करोड़ से अधिक लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर
दसियों हजारों की मौत और घायल
कई इलाकों में भुखमरी की पुष्टि
युद्धविराम पर असहमति जारी
पिछले दिनों RSF ने अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों के प्रस्तावित सीज़फायर को स्वीकार करने की बात कही थी। यह कदम अल-फ़ाशेर में हुए अत्याचारों की वैश्विक निंदा के बाद आया।
लेकिन सेना का कहना है कि वर्तमान हालात में युद्धविराम संभव नहीं, और जब तक मोर्चे पर उनके हित सुरक्षित नहीं होते, वे सहमत नहीं होंगे।
इसी बीच दोनों पक्ष केंद्रीय सूडान में और बड़ी लड़ाई के लिए हथियारों और लड़ाकों की तैनाती बढ़ा रहे हैं।
कोरदोफ़ान फिर से बना संघर्ष का केंद्र
RSF ने हाल ही में उत्तरी कोरदोफ़ान के बारा शहर पर भी कब्जा किया था — यह इलाका दारफूर और मध्य सूडान को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है। सेना ने दो महीने पहले इस शहर को वापस जीता था, लेकिन RSF की ताजा बढ़त ने स्थिति फिर से जटिल कर दी है।
मुख्य बिंदु
- युवा मतदाता पंजीकरण में 67% की वृद्धि दर्ज की गई है
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं
- 18-25 आयु वर्ग के युवा अब राजनीतिक बहसों में सक्रिय भागीदारी ले रहे हैं
- क्लाइमेट चेंज और डिजिटल राइट्स टॉप प्राथमिकताओं में शामिल हैं
"आज का युवा केवल मतदाता नहीं है, बल्कि वह नीति निर्माण में भी अपनी भूमिका निभाना चाहता है। यह परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है।"
सांख्यिकी और तथ्य
विशेषज्ञों का मानना है कि यह ट्रेंड अगले कुछ वर्षों में और भी मजबूत होगा। डिजिटल लिटरेसी और राजनीतिक जागरूकता का यह संयोजन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नया अध्याय लिख रहा है।
आगे का रास्ता
यह स्पष्ट है कि युवा पीढ़ी न केवल वोट देने में रुचि रखती है, बल्कि नीति निर्माण, सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रीय विकास में भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहती है। राजनीतिक दलों और सरकारों को इस बदलते परिदृश्य को समझकर अपनी रणनीति तैयार करनी होगी।
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