शहरों की हवा में छिपा नया खतरा: इनहलेबल माइक्रोप्लास्टिक्स
dailyhulchul
नई दिल्ली। भारतीय शहरों की हवा में अब एक नया और खतरनाक प्रदूषक मिला है – इनहलेबल माइक्रोप्लास्टिक्स (iMPs)। यह छोटे-छोटे प्लास्टिक के कण हैं, जो 10 माइक्रोमीटर से भी छोटे होते हैं और इन्हें इंसान आसानी से सांस के माध्यम से अपने फेफड़ों में ले सकता है। हालिया शोध में दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे बड़े शहरों की हवा में इन कणों की उपस्थिति पाई गई है।
शोध के प्रमुख निष्कर्ष:
- सबसे ज्यादा स्तर: कोलकाता (~14.23 µg/m³) और दिल्ली (~14.18 µg/m³)।
- चेन्नई (~4 µg/m³) और मुंबई (~2.65 µg/m³) में भी इनहलेबल माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा चिन्ताजनक है।
- अनुमान है कि एक सामान्य शहरी निवासी अपने जीवनकाल में लगभग 2.9 ग्राम माइक्रोप्लास्टिक्स साँस के माध्यम से ग्रहण कर सकता है, जो कि एक छोटी प्लास्टिक की बोतल के बराबर है।
स्रोत:
ये माइक्रोप्लास्टिक्स मुख्य रूप से सिंथेटिक कपड़े, प्लास्टिक पैकेजिंग, सड़कों पर टायर और जूते के घिसाव, और खराब तरीके से निपटाए गए प्लास्टिक कचरे से हवा में मिलते हैं।
स्वास्थ्य पर असर:
- ये सूक्ष्म कण फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं और रक्त प्रवाह में भी प्रवेश कर सकते हैं।
- यह कण विषैले रसायन और रोगजनक सूक्ष्मजीवों को अपने साथ ले जा सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि इससे श्वसन तंत्र पर असर, हार्मोन असंतुलन और दीर्घकालिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है, हालांकि अभी सीधे तौर पर किसी बीमारी से जुड़ाव की पुष्टि नहीं हुई है।
छुपा हुआ खतरा:
- फिलहाल इनहलेबल माइक्रोप्लास्टिक्स को भारत में हवा गुणवत्ता मानकों में नहीं मापा जाता।
- यह प्रदूषक शहरों की पहले से ही गंभीर वायु प्रदूषण समस्या में एक नया आयाम जोड़ता है।
शहरों में बढ़ती प्रदूषित हवा के बीच, इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि सिर्फ धूल और धुआँ ही नहीं, बल्कि प्लास्टिक भी हमारी सांसों में समा चुका है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भविष्य में इन माइक्रोप्लास्टिक्स की निगरानी और नियंत्रण को वायु गुणवत्ता नीति में शामिल किया जाना चाहिए।
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